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शनिवार, जुलाई 04, 2009

" स्वाइन - फ्लू और समलैंगिकता [पुरूष] के बहाने से "

" स्वाइन - फ्लू और समलैंगिकता [पुरूष] के बहाने से "


किसी अखबार में कोर्ट - रूलिंग के बारे में पढ़ा था उसकी भाषा कुछ ऐसी थी जैसे कोर्ट का होमोसेक्स्सुअल्टी या समलैंगिकता के पक्ष में निर्णय देना तथा शासन द्वारा सम्बंधित सजा की धारा समाप्त करना नैसर्गिक एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के आधार पर किया गया महान कार्य है | अगर समाचार-पत्र द्वारा उल्लिखित भाषा और निर्णय आदि की भाषा एक ही है ,
"तो फिर हमें सोचना पड़ेगा की नैसर्गिक एवं प्राकृतिक का वास्तविक अर्थ क्या हैं ? क्या वो जो कुछ बीमार सोच वाली मानसिकता के लोग परिभाषित कर रहे हैं ,या वो जो इस ' प्रकृति ' द्वारा हमें ' नैसर्गिक ' रूप से दिया या प्रदत्त किया गया है ?"
कहीं अति आधुनिक एवं तथा कथित प्रगति शील कहलाने की अंधी दौड़ में हम अपने पैरों पर कुल्हाडी तो नहीं मारे ले रहें हैं ,जब की अभी तक प्रकृति के साथ की गयी अपनी मूर्खताओं की अलामाते मानव - समाज भुगत रहा है ,फिर भी उसकी आंखे नहीं खुल रहीं हैं |||


ज्ञात सृष्टि में केवल मानव प्रजाति ही एक ऐसी प्रजाति है, जो बारहों मास अपनी इच्छानुसार यौन-क्रिया में सक्षम है जब की अन्य सभी का ऋतु-काल होता है और प्रकृति इस के द्वारा उनकी पजाति का वंशवर्धन व अग्रवर्धन कराती है ,यौन क्रीडा में आनन्द अन्य जीवों को भी आता ही होगा | परन्तु यह मानव प्रजाति ही है जो केवल और केवल मात्र अपने आनन्द के लिए ही रति-क्रीडा करती है ,और उस आनंद को बढाने हेतु नित नए एवं कृत्रिम तरीकों का भी अविष्कार करती रहती है ; यह '' होमोसेक्सुएलिटी '' भी उसी क्रम में आती है | यहाँ तक उसका स्वर्ग और जन्नत भी सेक्स रहित नहीं है वहां भी हूरें या अप्सराएँ है |

ब्रेकिंग न्यूज



किसी समाचार-पत्र में अभी हाल में यह समाचार पढ़ा उसमें उल्लेख था कि
''
डी यु '' , इसका पूर्ण रूप तो आप में से जिसके मतलब की यह ख़बर हो वह ख़ुद ढूंढे ; हाँ ख़बर में प्रोफेसर शब्द आने के कारण मैं ''यु '' का मतलब युनवर्सिटी मान रहा हूँ | हाँ तो '' युनवर्सिटी '' के एक प्रोफेसर [ डाक्टरेट है ] ने अपने किसी तथा- कथित बयान में कोर्ट तथा विधायिका द्वारा इस संदर्भित विषय के पक्ष जो भी निर्णय लिए है उस पर प्रसन्नता प्रकट की है , अरे भाई चौंकिए मत प्रोफेसर साहब अपने लिए नही अपने होनहार कुल -भूषण '' सपूत '' , भाई जब पूर्वज कह ही गए हैं '' लीक छोड़ चले तीन ,'शायर सिंह सपूत ' तो प्रकृति द्वारा निर्धारित लीक छोड़ने के कारण ''सपूत '' ही तो हुए ; के लिए , एक सुंदर - सुशील - होंनहार बहू , '''सपू ''' के लिए एक अर्धांगिनी ??? अरे नही भाई आप गलत समझ रहे हैं ,सही शब्द यहाँ पर ''' अर्धंगना ''' होगा , भाई मैं यहाँ भ्रमित हूँ कि सही शब्द क्या होगा , अगर आप की समझ में आजाये तो मुझे भी बतावें ||
है कोई योग्य स्त्रै लड़का की निगाह में ???

पूर्ण विवरण गत दिनों के किसी हिन्दी समाचार में ढूंढें यह सूचना वहीं से साभार उठाई गई है |


वैसे जान लें कि भारतीय समाज में यह ' विशिष्टता '' पहले से थी ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों में कुछ ग्रह स्थिति और योग होने पर पुरुष समलैंगिकता का फलित कहा गया है , और जहाँ तक याद आ रहा है अबदुर्र रहीम 'खानखाना' साहेब ने भी अपनी ज्योतिष्य की छोटी सी पुस्तक '' खेतु कौतुकम् " में भी एक दो दोहे इस संभावना पर '' हिन्दी फारसी संस्कृत मिक्स '' भाषा में कहे हैं ||
श्री काशिफ़ आरिफ़/Kashif आरिफ ने भी हिन्दी ब्लोगिंग की देन पर ' कुरान शरीफ का हवाला दिया है ' ||



वैसे पुरुष -समाज के लिए एक जानकारी और चेतावनी :--
ज्यादा वैज्ञानिक विवरण में जाते हुए संक्षेप में बता रहा हूँ 'पुरानी लोकोक्ति कि पोस्ट -कार्ड को तार समझाना की समझदारी ही से पढें :-->


''पुरषों में ''पुंसत्व '' का निर्धारण करने वाले ''जेनोमिक गुण सूत्रों '' कि संख्या खतरनाक ढंग से खतरनाक स्तर तक कम हो चुकी हैं और यह प्रक्रिया आगे भी जारी रहने की पूर्ण संभावनाएं पाई जा रहीं हैं ; जब कि स्त्रियों में ऐसा कोंई विशेष परिवर्तन नहीं सामने आया है | अतः पुरुष समाज सवधान रहें या नही अगले एक हजार से पॉँच-छः हजार साल बाद पुरुष के स्थान पर केवल " नाना पाटेकर के डाएलोग ' एक मच्छर आदमी को [पुरुषों के सन्दर्भ में ] .......वाली बिरादरी ही बचेगी , और फिर क्योंकि पुरुष संतान होगी नहीं अतः कुछ दिनों में पुरुष नामक प्रजाति का '' कुरु कुरु स्वाहाः '' हो जायेग और यह धरती ,शौकत थानवी के उपन्यास वाला परन्तु वास्तविक "ज़नानिस्तान " बन के रह जायेगी परन्तु वहाँ पुरुष तो थे पर व्यवस्थाएं उलट थीं ||
हाँ यह भी हो सकता है की जब भी उत्पन हो एक ही पुरूष संतान हो जिसे समाज की मुखिया या रानी अपने ' ' इस्तेमाल 'के लिए आलराईटस रिज़र्व' स्टाइल '' में रख ले ? चीटियों मधु -मक्खियों के तरीके से ? तब उस पुरूष के लिए युद्घ नही महायुद्ध हुआ करेंगे ,जिसपर ' गाथाएं ' लिखी जाया करेंगी ?


अभी तक तो औरों का कहा दोहरा रहा था अब मेरी बात, वैसे यह भी मेरा नहीं है शास्त्रों का ही कहा है परन्तु ईश्वरवादी हूँ अतः इसे ही मेरा ही विचार समझें '' शास्त्रों में कहा गया है कि जब - जब पृथ्वी का भार बढ़ जाता वह पुकार लगाती है '' तो भगवान पहले पृथ्वी का भार किसी प्रकार से जैसे हैजा [कालरा ] प्लेग , ताउन , रोज - रोज छोटे-राजाओं [ एक गाँव के चक्रवर्ती सम्राटों ] के मध्य मूंछ ऊँची नीची , कुत्ते की पूंछ की छोटी-बड़ी जैसी बातों पर युद्ध आदि से जिसमें गाँव के गाँव ,नगर के नगर आबादी विहीन हो जाते थे ,द्वारा इस का प्रबंधन कर दिया करते थे || हाँ अगर इससे भी काम न चले तो महाभारत करा के भार कम कर दिया करते थे ; अरे भाई आबादी कम होगी तो भार भी तो कम होगा ; प्रति व्यक्ति आप औसत ७६ किलो मान ही सकते हैं | वैस पहले देव दानव के युद्ध समान्य सी बात थी , जब तक ''अमृत '' का अविष्कार हुआ नहीं था | दानवों की ओर से शुक्राचार्य मृत-संजीवनी विद्या के साथ थे अतः जब देवता हार कर थक-थका जाते या ब्रेक टाइम आ जाता तो पृथ्वी वासियों को अपनी ओर से '' वरदान नामक गिफ्ट पॅकेज '' का करार कर भेज देते थे आदि-आदि;
" परन्तु अब लगता है कि यह सब कारगर नहीं रहा तो उपर वाला डैमेज कंट्रोल में स्वाइन-फ्लू , होमोसेक्स्सुअलिटी के वायरस भेज रहा है "


कुरु कुरु स्वाहा:





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गुरुवार, मई 14, 2009

"... ...धर्मनिरपेक्षता के बहने से-1 "

" बहाने अभी और भी है "

मैं जब अन्तर -झाल पर विचरण कर रहा था किन्ही जनाब अनिल राजिम वाले का एक लेख किन्ही सुमन ने " हिंदुस्तान का दर्द ''नामक ब्लॉग पर पोस्ट किया है बाद में पता चला वह उसका सन्लगनक-विस्तार है , पहले तो मैं उसी ब्लॉग पर टिप्पणी देने जा रहा था परन्तु जब टिप्पणी पोस्ट कराने लगा तो देखा की वोह टिप्पणी से ज्यादा एक पोस्ट होचुकी थी ; बहुत दिनों से कोई पोस्ट नही लिखी जा पारही थी ,
"सोचा क्यों न इसे ही अपने किसी ब्लॉग पर ही चेप दूँ और टिप्पणी देने के बजाये ' टिपिया ' ही डालूं फ़िर सोचमें पड़ गया कि विषय का मौजूं ब्लॉग कौन सा हो सकता है ,और अचानक ही मुझे " .......के बहाने से " यानि कि " चिटठा-अन्योनास्ति " कि याद आगई : बस फ़िर ..........." >>>>>>
लीजिये संदर्भित पोस्ट का आनंद लेने के लिए यदि '' सारी पेज नॉट फाउन्ड ''आता ही तो लोकसंघर्ष पर क्लिक कर के पेज खुलने के बाद दायीं और सूची में "यह क्या है सीरिज ढूंढें और उस पर क्लिक कर वह पेज खोलें और फ़िर दोनों का तुलनामक आनंद आप भी आनंद लीजिये . फ़िर आपसे मेरी बात हो तो ज्यादा ही सही ढंग से आप मेरी बात समझ पाएंगे ............ >>>>>>>>>>>>>>
पोस्ट पढ़ी ? क्या लगा ? मुझे तो शब्दों के हेर-फेर से एक ही लेख दोनों बार लिखी लगी ,मैं अनिल राजिमवाला या सुमन जी को नही जानता ,वैसे हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारा लोकतंत्र देता है ,यह उसका संविधानिक अधिकार है । पर क्या विरोध के लिए विरोध किया जाना उचित होता है ? भाषा शैली कम्युनिष्टों वाली होने के साथ साथ मुसलिम समाज के रहनुमा 'ठेकेदारकी सी है । क्या समझे ? इरादे तो बड़े

नेक?/खतरनाक दिख रहे हैं । ऐसे ही लोग नही चाहते की विभिन्न विचार धाराएँ पास -पास आवें ! नादिरशाह , महमूद गजनवी की बात करें तो ये सभी ' भारत वर्ष ' के लिए सदैव से विदेशी ही रहे और रहेंगें भी ।

आईये अब ' ' अफगानियों ' ' की बात करें अर्थात मुहमद गोरी और बाबर की इसके लिए हम लगभग पॉँच हजार वर्ष पूर्वके इतिहास के पृष्ठों को पलटना पडेगा अर्थात '' भीष्म पितामह " का महा-भारत काल । धृष्टराष्ट की पत्नी गांधारी एवं कौरवों पांडवों के मध्य महा-भारत युद्ध का सूत्रधार गांधारी का भ्राता शकुनी क्रमशः गाधार [ कंधार ] की राजकुमारी तथा राजकुमार थे उस काल में भारत का विदेश व्यापर का स्थलीय मार्ग अफगानिस्तान से ही हो कर था कहने का आशय या है की भारत व अफगानिस्तान एक प्रकार से सह-राष्ट्र ही थे । पाकिस्तान बनने से पूर्व तक और कुछ समय बाद तक भी अफगानी जब व्यापर करने निकलता था मुहं उठाये भारत याने हिंद और वो भी सीधे कलकत्ता ही जा रुकता था उन दिनों यह इतनी सामान्य सी बात थी की गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने" काबुली वाला " नामक उपन्यास ही लिखा डाला वैसे बाबर मूलतः चीनी तुर्किस्तान का निवासी था । बाबर ने 21 वर्ष की आयु में अफगानिस्तान के काबुल पर कब्जा किया ।

भारत की राजनीति का केन्द्र महा भारत काल से ही दिल्ली के आसपास हो चुकी थी जब से पुरुरवा के वंशजों [ कुरु या पुरु वंशी कौरव-पांडव ] ने अपनी राजधानी प्रतिष्ठानपुर { वर्त्तमान झूसी इलाहाबाद :: प्रयाग :: उत्तर प्रदेश U.P.} से हटा कर राजा हस्ती राज द्वारा मेरठ के पास हस्तिनापुर में स्थापित की और बाद में पांडवों [ कृष्ण-अर्जुन ] द्वारा '' अग्निदेव के अपच का उपचार करने हेतु खांडव वन को जलाने को अनुमति '' देने एवं अग्नि से मय दानव के परिवार की रक्षा अग्नि से करने के बाद खांडव वन की धरती पर मय दानव द्वारा पांडवों के लिए '' इन्द्रप्रस्थ '' नामक नगर बसाया गया यह दिल्ली के दक्षिण में था आज भी इंदरपत नामक गाँव उसकी याद दिलाता है कहने का आशय यह है कि भारतीय कि सत्ता का केन्द्र बिन्दु महा-भारत काल में ही आर्यावर्त के भारतीय खंड के केन्द्र कौशल ,कोशल ,प्रतिष्ठान-पुर,पाटलिपुत्र आदि से खिसक कर उत्तर-पश्चिम के मध्य भाग के मध्य क्षेत्र हस्तिनापुर , इन्द्रप्रस्थ , मथुरा और अन्तोगत्वा दिल्ली में स्थानांतरित हो चुका था पृथ्वी राज चौहान के नाना अनंगपाल जिसका राज्य पृथ्वी राज ने उतराधिकार में पाया के काल को दिल्ली भारतीय राजनीतिक शक्ति का स्थायी केन्द्र हो चुका था और यह मन जाने लगा कि दिल्ली जिसकी भारत का शासक वही होने हने को तो यह मात्र एक सामाजिक मान्यता भर थी परन्तु जनमानस मेन बड़ी गहरे बैठी थी , और सुदूर पश्चिम तक फैली हुई थी अतः जो भी पश्चिम से भारत विजय हेतु निकलता वह दिल्ली पर अवश्य ही अधिकार करना चाहता था मुहमद गोरी से आरंभ हुआ यह क्रम बाबर तक जारी रहा । 1523-24 में बाबर के ही चचेरे भाईयों ने उसे धोखे से अफगानिस्तान से खदेड़ दिया थका हारा बाबर अपने वफ़ादार लगभग ग्यारह सवा ग्यारह हजार सैनिकों सहित पंजाब में घुसा एक ठौर ढूंढ़ते बाबर को खुदाई पैगाम की तरह इसी समय दो संदेशे मिले एक तो दिल्ली के< सुलतान इब्राहीम लोदी के चाचा आलम खान का जिसने इस लालच में बाबर से मदद मांगी थी की वह इब्राहीम लोदी को हराने के बाद काबुल लौट जाएगा और दिल्ली की गद्दी उसकी [ इब्राहीम लोदी के चाचा आलम खां की ]हो जायेगी दूसरा राणा सांगा का जिसने अपने शत्रुओं से बदला लेने के लिए बाबर की तोपों की लालच में मदद चाही थी , मेरा अनुमान है की इन दोनों को बाबर और उसके चचेरे भाईयों के बीच के झगडें के बारे में कुछ मालूम नही था उन्हें आशा थी कि बाबर लूट-पाट कर के काबुल लौट जाएगा परन्तु सब उलट-पलट हो गया< और बाबर के पास यही बसने कि मजबूरी के सिवा कोई चारा था भी तो नाही< । शेष अगले अंक में

...>>>> धर्मनिरपेक्षता के बहने -2

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