इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

गुरुवार, मई 14, 2009

"... ...धर्मनिरपेक्षता के बहने से-1 "

" बहाने अभी और भी है "

मैं जब अन्तर -झाल पर विचरण कर रहा था किन्ही जनाब अनिल राजिम वाले का एक लेख किन्ही सुमन ने " हिंदुस्तान का दर्द ''नामक ब्लॉग पर पोस्ट किया है बाद में पता चला वह उसका सन्लगनक-विस्तार है , पहले तो मैं उसी ब्लॉग पर टिप्पणी देने जा रहा था परन्तु जब टिप्पणी पोस्ट कराने लगा तो देखा की वोह टिप्पणी से ज्यादा एक पोस्ट होचुकी थी ; बहुत दिनों से कोई पोस्ट नही लिखी जा पारही थी ,
"सोचा क्यों न इसे ही अपने किसी ब्लॉग पर ही चेप दूँ और टिप्पणी देने के बजाये ' टिपिया ' ही डालूं फ़िर सोचमें पड़ गया कि विषय का मौजूं ब्लॉग कौन सा हो सकता है ,और अचानक ही मुझे " .......के बहाने से " यानि कि " चिटठा-अन्योनास्ति " कि याद आगई : बस फ़िर ..........." >>>>>>
लीजिये संदर्भित पोस्ट का आनंद लेने के लिए यदि '' सारी पेज नॉट फाउन्ड ''आता ही तो लोकसंघर्ष पर क्लिक कर के पेज खुलने के बाद दायीं और सूची में "यह क्या है सीरिज ढूंढें और उस पर क्लिक कर वह पेज खोलें और फ़िर दोनों का तुलनामक आनंद आप भी आनंद लीजिये . फ़िर आपसे मेरी बात हो तो ज्यादा ही सही ढंग से आप मेरी बात समझ पाएंगे ............ >>>>>>>>>>>>>>
पोस्ट पढ़ी ? क्या लगा ? मुझे तो शब्दों के हेर-फेर से एक ही लेख दोनों बार लिखी लगी ,मैं अनिल राजिमवाला या सुमन जी को नही जानता ,वैसे हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारा लोकतंत्र देता है ,यह उसका संविधानिक अधिकार है । पर क्या विरोध के लिए विरोध किया जाना उचित होता है ? भाषा शैली कम्युनिष्टों वाली होने के साथ साथ मुसलिम समाज के रहनुमा 'ठेकेदारकी सी है । क्या समझे ? इरादे तो बड़े

नेक?/खतरनाक दिख रहे हैं । ऐसे ही लोग नही चाहते की विभिन्न विचार धाराएँ पास -पास आवें ! नादिरशाह , महमूद गजनवी की बात करें तो ये सभी ' भारत वर्ष ' के लिए सदैव से विदेशी ही रहे और रहेंगें भी ।

आईये अब ' ' अफगानियों ' ' की बात करें अर्थात मुहमद गोरी और बाबर की इसके लिए हम लगभग पॉँच हजार वर्ष पूर्वके इतिहास के पृष्ठों को पलटना पडेगा अर्थात '' भीष्म पितामह " का महा-भारत काल । धृष्टराष्ट की पत्नी गांधारी एवं कौरवों पांडवों के मध्य महा-भारत युद्ध का सूत्रधार गांधारी का भ्राता शकुनी क्रमशः गाधार [ कंधार ] की राजकुमारी तथा राजकुमार थे उस काल में भारत का विदेश व्यापर का स्थलीय मार्ग अफगानिस्तान से ही हो कर था कहने का आशय या है की भारत व अफगानिस्तान एक प्रकार से सह-राष्ट्र ही थे । पाकिस्तान बनने से पूर्व तक और कुछ समय बाद तक भी अफगानी जब व्यापर करने निकलता था मुहं उठाये भारत याने हिंद और वो भी सीधे कलकत्ता ही जा रुकता था उन दिनों यह इतनी सामान्य सी बात थी की गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने" काबुली वाला " नामक उपन्यास ही लिखा डाला वैसे बाबर मूलतः चीनी तुर्किस्तान का निवासी था । बाबर ने 21 वर्ष की आयु में अफगानिस्तान के काबुल पर कब्जा किया ।

भारत की राजनीति का केन्द्र महा भारत काल से ही दिल्ली के आसपास हो चुकी थी जब से पुरुरवा के वंशजों [ कुरु या पुरु वंशी कौरव-पांडव ] ने अपनी राजधानी प्रतिष्ठानपुर { वर्त्तमान झूसी इलाहाबाद :: प्रयाग :: उत्तर प्रदेश U.P.} से हटा कर राजा हस्ती राज द्वारा मेरठ के पास हस्तिनापुर में स्थापित की और बाद में पांडवों [ कृष्ण-अर्जुन ] द्वारा '' अग्निदेव के अपच का उपचार करने हेतु खांडव वन को जलाने को अनुमति '' देने एवं अग्नि से मय दानव के परिवार की रक्षा अग्नि से करने के बाद खांडव वन की धरती पर मय दानव द्वारा पांडवों के लिए '' इन्द्रप्रस्थ '' नामक नगर बसाया गया यह दिल्ली के दक्षिण में था आज भी इंदरपत नामक गाँव उसकी याद दिलाता है कहने का आशय यह है कि भारतीय कि सत्ता का केन्द्र बिन्दु महा-भारत काल में ही आर्यावर्त के भारतीय खंड के केन्द्र कौशल ,कोशल ,प्रतिष्ठान-पुर,पाटलिपुत्र आदि से खिसक कर उत्तर-पश्चिम के मध्य भाग के मध्य क्षेत्र हस्तिनापुर , इन्द्रप्रस्थ , मथुरा और अन्तोगत्वा दिल्ली में स्थानांतरित हो चुका था पृथ्वी राज चौहान के नाना अनंगपाल जिसका राज्य पृथ्वी राज ने उतराधिकार में पाया के काल को दिल्ली भारतीय राजनीतिक शक्ति का स्थायी केन्द्र हो चुका था और यह मन जाने लगा कि दिल्ली जिसकी भारत का शासक वही होने हने को तो यह मात्र एक सामाजिक मान्यता भर थी परन्तु जनमानस मेन बड़ी गहरे बैठी थी , और सुदूर पश्चिम तक फैली हुई थी अतः जो भी पश्चिम से भारत विजय हेतु निकलता वह दिल्ली पर अवश्य ही अधिकार करना चाहता था मुहमद गोरी से आरंभ हुआ यह क्रम बाबर तक जारी रहा । 1523-24 में बाबर के ही चचेरे भाईयों ने उसे धोखे से अफगानिस्तान से खदेड़ दिया थका हारा बाबर अपने वफ़ादार लगभग ग्यारह सवा ग्यारह हजार सैनिकों सहित पंजाब में घुसा एक ठौर ढूंढ़ते बाबर को खुदाई पैगाम की तरह इसी समय दो संदेशे मिले एक तो दिल्ली के< सुलतान इब्राहीम लोदी के चाचा आलम खान का जिसने इस लालच में बाबर से मदद मांगी थी की वह इब्राहीम लोदी को हराने के बाद काबुल लौट जाएगा और दिल्ली की गद्दी उसकी [ इब्राहीम लोदी के चाचा आलम खां की ]हो जायेगी दूसरा राणा सांगा का जिसने अपने शत्रुओं से बदला लेने के लिए बाबर की तोपों की लालच में मदद चाही थी , मेरा अनुमान है की इन दोनों को बाबर और उसके चचेरे भाईयों के बीच के झगडें के बारे में कुछ मालूम नही था उन्हें आशा थी कि बाबर लूट-पाट कर के काबुल लौट जाएगा परन्तु सब उलट-पलट हो गया< और बाबर के पास यही बसने कि मजबूरी के सिवा कोई चारा था भी तो नाही< । शेष अगले अंक में

...>>>> धर्मनिरपेक्षता के बहने -2

2 टिप्पणियाँ:

Nirmla Kapila 30 जून 2009 को 9:55 am  

मुझ जैसी अल्पग्य के लिये तो आपके ब्लोग पर आना ही सार्थक हो गया ीआपके बहुआयामी प्रतिभा से परभावित हूँ और आपसे सहमत भी हूँ आभार्

''ANYONAASTI '' {अन्योनास्ति} 30 जून 2009 को 10:41 pm  
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
:)) ;)) ;;) :D ;) :p :(( :) :( :X =(( :-o :-/ :-* :| 8-} :)] ~x( :-t b-( :-L x( =))

एक टिप्पणी भेजें

टीपियाने ने पहले पढ़ने के अनुरोध के साथ:
''गंभीर लेखन पर अच्छा,सारगर्भित है ,कहने भर सेकाम नही चलेगा;पक्ष-विपक्ष की अथवा किसी अन्य संभावना की चर्चा हेतु प्रस्तुति में ही हमारे लेखन की सार्थकता है "
हाँ विशुद्ध मनोरनजक लेखन की बात अलग है ; गंभीर लेखन भी मनोरनजक {जैसे 'व्यंग'} हो सकता है '|
वैसे ''पानाला गिराएँ जैसे चाहे जहाँ, खटोला बिछाएँ
कहाँ यह आप की मर्ज़ी ,आख़िरी खुदा तो आप ही हो ''

"रोमन[अंग्रेजी]मेंहिन्दी-उच्चारण टाइप करें:

"रोमन[अंग्रेजी]मेंहिन्दी-उच्चारण टाइप करें: नागरी हिन्दी प्राप्त कर कॉपी-पेस्ट करें "

विजेट आपके ब्लॉग पर

======================================================= =======================================================
xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx

  © Blogger template The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP