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शनिवार, दिसंबर 27, 2008

" फ़िर कंधमॉल के बहाने : अबकी निशाने से "

कंधमाल के बाद और कंधमॉल से आगे अभी और भी है
बहुत दिनों तक प्रतीक्षा की परन्तु मेरे यक्ष- प्रश्न का उत्तर अभी तक नही मिला है |और सम्पूर्ण विश्व के "विश्वमय पति " जी की प्रकृति एवं :विचार-धारा के अन्य विद्वानों से ही किसी विद्वान् का उत्तर नही प्राप्त हुआ है | मगर मै " इसी ,उसी, यानी किसी किसी ' .....के बहाने से'फ़िर हाजिर हूँ |"

" मेरा सुधि पाठकों से विनम्र निवेदन है कि मेरी शंकाओं को दूर -दूर तक ' संक्रामक [छूत] ' के रोग की तरहफैला दें ,किसी भी भाषा- भाषी से उसी की भाषा में प्राप्त उत्तर भी मुझे स्वीकार है ,केवल उत्तर की भाषा को लेख में स्पष्ट करदे [जय हो गूगल बाबा के ट्रांसलेटर की ]|| "
मेरा बहाना अभी भी वही है यानि ......" कंधमाल के बहाने से "; पिछली बार इस लेख में मैं यह पूछना भूल गया था
" यह कहाँ की विधिक नियमावली अथवा संविधान या धर्म- शास्त्र के ग्रन्थ के आधार पर किया न्याय है कि जब किसी सम्प्रदाय का कोई व्यक्ति किसी अन्य धर्म या सम्प्रदाय के देवी -देवता को अपनाएं तो उसे मतान्तर या या धर्मांतरण कहा जाए परन्तु जब ये ' तथाकथित हिन्दू ' ऐसा करे तो वह देवी देवता चुराने का अपराध या पाप कहलाये ?"
जब कंधमाल या उड़ीसा में ईसाई समाज -सम्प्रदाय 'आदिवासियों 'अथवा श्री स्वपन दास गुप्ता के अनुसार अनुसूचित जाति के देवी देवता वास्तव में उनसे छीन कर नया देवी देवता थमा रहे हैं ,' श्री विश्व मय जी कि दृष्टि में इसे क्या कहा जाना चाहिए ?
खैर जैसा मैं उपरोक्त लेख में कह चुका हूँ कि संतुष्टी -कारक उत्तर न मिलने तक मेरा यह प्रश्न, यक्ष-प्रश्न बना रहेगा || मेरे लिए यह जानना बहुत महत्त्वपूर्ण है , क्योंकि मेरे स्वर्गीय [ मेरी दृष्टि में ] पूज्य पिता श्री कहा करते थे कि हम हिंदू- सिक्ख हैं ; अब इसी समय पूछने न लग जाईयेगा कि अगर हिंदू हैं तो सिक्ख कैसे !!!!!?????? और सिक्ख हैं तो हिंदू हो ही नही सकते || आप मेरे प्रश्न का उत्तर दें आप को इस पश्न का उत्तर अपने आप मिल जायेगा यदि न मिला तब मैं दूंगा |अगर श्री विश्वमय पति जी स्वयम उत्तर दे मेरी जिज्ञासा को शांत कर सकें तो अति - उत्तम , कहें तो सोने में सुहागा जैसा होगा ; यह जिज्ञासा भी उन्हीके लेख की देन है, '' तुम्ही ने दर्द दिया है , तुम्ही दावा देना '' |
सोचरहा हूँ कि अब निशाना लगा ही डालूं वरना यदि कहीं शिकार छटक कर भाग गया या किसी और का निशाना लग गया तो आप का ये बन्दा टापता और हाथ मलता ही रह जाए |

कंधमॉल- कांड के संदर्भ में आप को याद होगा वाशिंगटन ,लन्दन 'पेरिस यानि विश्व कि चहुँ दिशाओं से भारत को आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा था ,सबसे ज्यादा चिंचिनाये " रोम के पोप " थे | स्थानीय परिस्थितियों - वास्तविकताओं को बिना जाने -समझे , वे सभी भारत सरकार से जोरदार विरोध प्रगट करते रहे | अब मैं अपना निशाना बता रहा हूँ ,
" दूसरी ओर फ्रांस में एक कानून के कारण समस्या झेल रहे खालसा -सिक्खों के साथ भारत सरकार कितनी जोरदार ढंग से खड़ी हुई थी या है , यह , हम आज तक नही जान पाए हैं "!--!--
आगे बढ़ने से पूर्व फ्रांस के सिक्खों कि समस्या क्या है इस के बारे में भी जान लेना उचित होगा ......>>
.....>" फ्रांस में एक कानून है कि आप सार्वजनिक स्थलों पर कोई भी ऐसा चिन्ह या प्रतीक धारण एवं प्रर्दशित नही कर सकते जो ''किसी धर्म का प्रतीक हों या जो आप कि धार्मिक आस्था को सार्वजनिक रूप से प्रकट करतें हों [[ ईसाई धार्मिक चिह्नों के बारे में मुझे कोई सूचना नही है ]], और यही विधान ' सिक्खों के लिए समस्या बन गया हैं , वे पगड़ी या साफा नही बाँध सकते; क्यों कि इसे वहां पर धार्मिक चिन्ह माना गया है ''


'कंधमाल के बहाने ' लेख से पहले इस ब्लॉग की रूप रेखा कुछ और थी ,परन्तु जब तक यह ब्लॉग मूर्त हो पाता कंधमॉल की घटना होचुकी थी '' फ्रांस के सिक्खों '' की उपरोक्त समस्या से जुड़ी खबरों पर दृष्टि पड़ गयी और कंधमाल के बारे में पॉप का बयान भी आचुका था , बस इसी के साथ इस ब्लॉग ' की '' रूप रेखा , सूत्र वाक्य और मूलमंत्र '' आदि विचारों में कौंध गया जिसका परिणाम आप के समक्ष '' ''चिटठा -अन्योनास्ति ब्लॉग और उस पर पहली पोस्ट '' कंधमाल के बहाने से '' के रूप में दिख रहा है { देखें }|
  • शुरू शुरू में रोमन हिन्दी लिखने का अभ्यास न होने से बड़ी अनगढ़ सी पोस्ट प्रकाशित हुई | फ़िर मनपसंद टेम्पलेट्स ढूंढ़ने के चक्कर में गड़बड़ होती रही और उस लेख की दूसरी पोस्ट जिसमें ' सिक्खों से जुडी समस्या उठाई जानी थी लेट होने लगी | काफी देर हो जाने के कारण और समाचार पत्रों में उक्त समस्या से जुड़ी कोई नई ख़बर न होने के कारण मैं निर्णय नही ले पा रहा था कि उसे उठाऊं या नही कि अचानक हाल में उक्त ख़बर पुनः दिख गयी ; तुंरत पहली पोस्ट को सुधार कर पुनः प्रकाशित कर यह पोस्ट प्रकाशन हेत लिखने लगा |
हाँ तो मैं बात कर रहा था '' फ्रांस '' देश की
'' यह वही फ्रांस देश है जहाँ एक ऐसा कानून लागू है कि कोई अपने धार्मिक-प्रतीक [चिन्ह ] सार्वजनिक रूप से पहन कर उन्हें प्रर्दशित नही कर सकता | इसी '' फ्रांस '' देश ने भी भारत के प्रधान मंत्री माननीय मन मोहन सिंह जी की फ्रांस यात्रा के समय '' कंधमाल के सन्दर्भ '' में अपनी बड़ी जोरदार आपत्ति दर्ज कराई थी ;परन्तु एक सिक्ख प्रधान मंत्री से उसके देश[ भारत ] में वहीं के नागरिकों [ भारत ] के आपसी विवाद के बारे में अपना विरोध दर्ज कराना तो फ्रांस के राष्ट्राध्यक्ष को याद रहा क्यों कि उनमें से विवाद का एक पक्ष सरकोजी का '' सधर्मी '' जो था परन्तु उन्ही मेहमान प्रधान-मंत्री के 'सधर्मियों ' के साथ एक साधारण सी बात के लिए राष्ट्रपति सरकोजी के अपने देश [फ्रांस ]में हो रहा अन्याय फ्रांस के राष्ट्रपति 'सरकोजी ' को याद नही रहा |"
आगे बढ़ने से पहले यदि हम '' सिक्ख पंथ एवं उसके धार्मिक प्रतीकों '' के बारे में कुछ जान लें तो उचित होगा |
अगर मैं यह कहूँ कि '' सिक्ख '' पंथ इस सृष्टि का प्राचीनतम पंथ है तो आप मेरे कथन पर आश्चर्य भी प्रकट करेंगे और मुझे तथ्यों से अंजान मुर्ख समझ कर हँसेंगे भी अवश्य ही । मैं अपने कथन के समर्थन में विस्तार में नही जा रहा हूँ इस विषय पर अलग से अपने किसी अन्य ब्लॉग पर पोस्ट देनें का प्रयत्न करूँगा ।
"{,पहले पूरा मैटर इसी आलेख में देरहा था देखा पोस्ट विषय से भटक कर लम्बी हो रही है एवं विवरण इस ब्लॉग के सूत्र - वाक्य के लिए मौजूं भी नही है ,} ''
प्राचीनतम ''गुरु शिष्य'' परम्परा के क्रम में आज का ''सिक्ख '' पंथ अस्तित्व में आया और गुरु-शिष्य संबंधों को शाश्वत कर गया
|

आज के '' सिक्ख पंथ '' के उद्भव एवं आरंभ बारे में एक भ्रान्ति सामान्यतः लोगों यहाँ तक कि स्वयं सिखों में विशेष रूप से है कि सिक्ख पंथ का प्रारम्भ या स्थापना '' दशम गुरुमहाराज ' गुरु गोविन्द सिंह देव ' जी द्वारा " किया गया है ; यह मान्यता एवं धारण ग़लत है ।

  • '' सिक्ख पंथ'' का उद्भव प्रथम गुरु - महाराज '' गुरु नानक देव जी '' [१४६९-१५३९] के जीवन काल में ही होगया था जो अगले आठ गुरुओं के जीवन काल के साथ परवान चढ़ता रहा और नवे बादशाह गुरु तेग बहादुर जी महाराज जी के जीवन काल में इतनी ऊँचाई तक पहुँच गया कि समाज के सताए हुए लोग उनके द्वारे '''त्राहि-माम् ;; त्राहि-माम् ''' करते हुए पहुँचने लगे थे, और उन्हों ने भी शरणागतों को निराश नही किया ; ''' उनकी रक्षा हेतु अपना बलिदान दे ; अपना शीश दे समाज में त्याग और धर्म का मर्म स्थापित किया '''|

दशम गुरु महाराज गोविन्द सिंह जी द्वारा उसी सिक्ख -पंथ को परमार्जित कर उसी सिक्ख -पंथ के अंतर्गत खालसा-समाज का निर्माण कर सिक्खी को पूर्ण पंथ का दर्जा एवं सम्मान दिला दिया गयाउन्होंने किसी सामाजिक- मान्यता एवं परम्परा एवं समाज के पंथ बनने की प्रमुख शर्तों की पूर्ति करते हुए , अभी तक नानक शाही सिक्ख कहलाने वाले समाज को ''विधान : निशान :कमान : प्रधान : स्थान ''पाँचों लाक्षणिक - प्रमाण { अंग }दे पूर्ण पंथ बना दिया

  • प्राचीन गुरु-शिष्य परम्परा में बताये गयी हर उस बात को मानना पालन करना जिनका उपदेश ' गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु गोविन्द सिंह जी ' तक दसों गुरु दे गए हैं का अनुपालन करना प्रत्येक सिक्ख का कर्त्तव्य है । पूरे समाज को तीन अंगों में बांटा गया

{1} सिक्ख - संगत :- -उन सभी को कहा गया जो गुरु के सामान्य उपदेशों का पालन करते हुए '' ग्रन्थ साहेब '' को ग्यारहवां एवं अन्तिम गुरु मानने के अतिरिक्त इनके लिए अन्य कोई हार्ड एंड फास्ट नियम नही है जिस कारण से यदि वे ' सनातन-धर्मी नही है , तब भी सिक्ख समाज या संगत में भागीदार हो सकते हैं ,यह उन्हें अपने व्यक्तिगत धर्म के अनुपालन से नही रोकता ।

{2} "खालसा समाज :- को ही सिक्ख समाज : सिक्ख संगत का व्यवस्थापक अधिकार प्राप्त हैं '' इसी खालसा - समाज की स्थापना दसवें गुरु ,गुरु गोविन्द सिंह जी ने की थी । " इस खालसा संगत या समाज के लिए कुछ नियम निर्धारित हैं उनका पालन किया जाना अनिवार्यता है ।

{3} निहंग खालसा :--सवें गुरु महराज ने अपने उस युग की परम्परा के अनुसार पूरे खालसा संगत के एक अंश को 'धर्म -धार्मिक -भक्तों की रक्षा हेतु नियमित सेना का रूप देकर उन्हें ' ''निहंगसिक्ख '' का नाम दिया ; ये सदैव सैनिक गणवेश में रहते हैं । { उपरोक्त तीनो तथा अन्य तथ्यों का उल्लेख मैं अपने अलग ब्लॉग में विस्तार से करूँगा }

  • एक "खालसा "के लिए निर्धारित पञ्च ककार '''केश :कंघ :कड़ा :कच्छ :और :कृपाण '''ही वे प्रतीक - चिन्ह हैं जिन्हें धारण करना हर ''खालसा सिक्ख ''के लिए अनिवार्य होता है एक पूर्ण सिक्ख गुरुद्वारे में गुरु -ग्रन्थ साहिब जी के समक्ष अमृत पान कर पांचो प्रतीक ककार ग्रहण कर खालसा सजता हैकोई भी सिख उपरोक्त पञ्च ककार धारण करने के लिए स्वतन्त्र तो है , परन्तु जब तक वह ग्रन्थ-साहेब को साक्षी मान पञ्च - प्यारों प्रदत अमृत - पान नही करता वह खालसा कहलाने अधिकारी नही हो सकता । यहाँ तक स्वयं खालसा-पंथ के प्रवर्तक श्री गुरु गोविन्द सिंह जी ने भी नियमों एवं परम्परा का पालन किया '' प्रथम पञ्च -प्यारों को अमृत छकाने के बाद उन्होंने उन उनके हाथ से अमृत -पान कर खालसा साज सजाया था
उपरोक्त विवरण प्रस्तुत करने का मेरा एक ही उद्देश्य है , अपने सिख भाईयों भारत सरकार के नुमाएंदों को यह स्पष्ट करना है कि वे फ्रांस सरकार को बतावें कि ये पगड़ी या साफा स्वयं में कोई धार्मिक प्रतीक न हो कर हमारे देश के पारंपरिक पहनावे का एक अंग है , हिस्सा है इसका उपयोग सर एवं ''केशों '' को धूल - मिट्टी से बचाना होता है प्राचीन कल में इसे बंधाते समय इनके मध्य , एक-दूसरे को काटते लोहे के दो छल्लों को पिरो कर इसे ही शिरास्त्रण को रूप दे दिया जाता था । जब तेल - धनी अरबियों को अपनी पारंपरिक परिधान पहनने की स्वतंत्रता है तो भारतीय - सिखों को पगड़ी - साफा क्यों नही ?


समस्याओं के हल होने की प्रतीक्षा में ''अन्योनास्ति ''

सुना है कि नए बारहा -खड़ी में ग से अब गदा नही गधा पढाया जा रहा है लालू भाई ने पिछले चुनावों में गोधरा पढ़ाने की कोशिश की बिहार का राज पाट चला गया ।




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टीपियाने ने पहले पढ़ने के अनुरोध के साथ:
''गंभीर लेखन पर अच्छा,सारगर्भित है ,कहने भर सेकाम नही चलेगा;पक्ष-विपक्ष की अथवा किसी अन्य संभावना की चर्चा हेतु प्रस्तुति में ही हमारे लेखन की सार्थकता है "
हाँ विशुद्ध मनोरनजक लेखन की बात अलग है ; गंभीर लेखन भी मनोरनजक {जैसे 'व्यंग'} हो सकता है '|
वैसे ''पानाला गिराएँ जैसे चाहे जहाँ, खटोला बिछाएँ
कहाँ यह आप की मर्ज़ी ,आख़िरी खुदा तो आप ही हो ''

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